किसी व्यक्ति की मृत्यु केवल एक घटना नहीं होती। कई बार वह समाज के भीतर दबे हुए सवालों, आक्रोशों और असंतोषों को भी उजागर कर देती है। भरत तिवारी की मौत भी ऐसी ही एक घटना बनकर सामने आई है। उनकी मृत्यु के बाद जिस तरह लोगों का हुजूम उमड़ा, जिस तरह गांव-समाज में शोक की लहर दौड़ी और जिस तरह सोशल मीडिया से लेकर चौराहों तक उनकी चर्चा हुई, उसने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या था भरत तिवारी में कि हजारों लोग उनके लिए रो पड़े? अगर वह कानून की नजर में अपराधी थे, तो समाज का एक बड़ा वर्ग उन्हें अपना नायक क्यों मान रहा था? यदि उन्होंने व्यवस्था के खिलाफ हथियार उठाया, तो उनके समर्थन में इतनी बड़ी भावनात्मक लहर क्यों दिखाई दी? इन सवालों के उत्तर केवल कानून की किताबों में नहीं मिलेंगे। इसके लिए समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को एक साथ समझना होगा।
भरत तिवारी: अपराधी या व्यवस्था से निराश नागरिक?
उपलब्ध तथ्यों के अनुसार भरत तिवारी के खिलाफ पहले से कोई बड़ा आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। उन्हें किसी संगठित अपराधी गिरोह का सदस्य नहीं माना जाता था। उनके समर्थक उन्हें गरीबों की आवाज, संघर्षशील व्यक्ति और सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ इंसान बताते हैं। यहीं से कहानी जटिल हो जाती है।
सामान्य अपराधी और व्यवस्था से टकराने वाले व्यक्ति के मनोविज्ञान में बड़ा अंतर होता है। अपराधी का लक्ष्य प्रायः व्यक्तिगत लाभ, शक्ति या आर्थिक फायदा होता है। जबकि व्यवस्था से निराश व्यक्ति अक्सर खुद को किसी बड़े उद्देश्य का प्रतिनिधि मानने लगता है। मनोविज्ञान में इसे “मोरल मिशन सिंड्रोम” कहा जाता है। ऐसे लोग यह विश्वास करने लगते हैं कि वे समाज के लिए लड़ रहे हैं और उनका संघर्ष व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामूहिक है। जब यह भावना बहुत मजबूत हो जाती है, तब व्यक्ति कानून और नैतिकता के बीच अंतर करना बंद कर देता है। उसे लगता है कि उसका उद्देश्य इतना बड़ा है कि उसके लिए नियमों को तोड़ना भी उचित है।
जब व्यवस्था से भरोसा उठने लगता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है। जब कोई व्यक्ति अपनी शिकायत लेकर प्रशासन, पुलिस, जनप्रतिनिधियों और न्यायिक तंत्र के पास जाता है तो उसे उम्मीद होती है कि उसकी बात सुनी जाएगी। लेकिन यदि लंबे समय तक उसे यह महसूस होने लगे कि उसकी सुनवाई नहीं हो रही, तो उसके भीतर निराशा पैदा होती है। यह निराशा धीरे-धीरे आक्रोश में बदल सकती है।
विश्व के अनेक मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि हिंसक आंदोलनों में शामिल अधिकांश लोग जन्मजात हिंसक नहीं होते। वे लंबे समय तक उपेक्षा, असफलता और असंतोष का अनुभव करते हैं। अंततः वे यह मान बैठते हैं कि शांतिपूर्ण तरीके बेकार हैं। भरत तिवारी के समर्थकों का दावा भी कुछ ऐसा ही है। उनका कहना है कि वह वर्षों से लोगों की समस्याओं को लेकर संघर्ष कर रहे थे।
सवाल यह नहीं है कि यह दावा सही है या गलत। सवाल यह है कि आखिर इतने लोग इस दावे पर विश्वास क्यों कर रहे हैं?
जननायक बनने की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया
इतिहास गवाह है कि समाज में कुछ लोग औपचारिक पदों के बिना भी अत्यधिक लोकप्रिय हो जाते हैं। उनके पास न कोई सरकारी कुर्सी होती है और न कोई संवैधानिक अधिकार। फिर भी लोग उन्हें अपना नेता मान लेते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इसके पीछे तीन कारण होते हैं।
जब आम आदमी संकट में होता है और कोई व्यक्ति तुरंत उसकी मदद करता है, तो उसके प्रति विश्वास पैदा होता है। लोग उन नेताओं को ज्यादा पसंद करते हैं जो उनकी भाषा बोलते हैं और उनके बीच रहते हैं। जब कोई व्यक्ति व्यवस्था से टकराता हुआ दिखाई देता है तो समाज का एक वर्ग उसे अपना प्रतिनिधि मानने लगता है।
क्या भरत तिवारी शहीद मानसिकता के शिकार थे? मनोविज्ञान में एक शब्द है — “मार्टर कॉम्प्लेक्स” अर्थात शहीद मानसिकता। इस मानसिकता में व्यक्ति को यह विश्वास हो जाता है कि उसका बलिदान किसी बड़े उद्देश्य की पूर्ति करेगा। वह अपने जीवन से ज्यादा अपने संदेश को महत्व देने लगता है। ऐसे लोग जोखिमों को जानते हैं। उन्हें यह भी पता होता है कि उनके कदमों का परिणाम क्या हो सकता है। फिर भी वे पीछे नहीं हटते। यदि भरत तिवारी वास्तव में पुलिस के सामने लाइव प्रसारण के साथ पहुंचे थे, तो यह संकेत देता है कि वह परिस्थितियों की गंभीरता को समझ रहे थे। संभवतः उन्हें विश्वास था कि सार्वजनिक निगरानी में पुलिस उन पर कठोर कार्रवाई नहीं करेगी। लेकिन घटनाएं उनकी अपेक्षा के अनुरूप नहीं चलीं।
भीड़ क्यों रोती है?
यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। किसी व्यक्ति की अंतिम यात्रा में हजारों लोगों का जुटना केवल उसकी मृत्यु पर शोक नहीं होता। यह एक सामाजिक संदेश भी होता है। लोग कई कारणों से किसी मृत व्यक्ति के प्रति भावनात्मक रूप से जुड़ते हैं। व्यक्तिगत सहायता की स्मृतियां। संघर्ष की साझा कहानियां। व्यवस्था के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध। समाजशास्त्रियों का मानना है कि कई बार अंतिम यात्रा मृत व्यक्ति से ज्यादा जीवित लोगों की भावनाओं का प्रदर्शन होती है। लोग उस व्यक्ति में अपनी उम्मीदें देखते हैं। जब वह व्यक्ति चला जाता है तो उन्हें लगता है कि उनकी आवाज भी कमजोर हो गई है।
लोकतंत्र के लिए चेतावनी
भरत तिवारी प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद बड़ी संख्या में लोग उसे नायक मानने लगें, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था को यह समझने की जरूरत होती है कि कहीं न कहीं संवाद की कमी रह गई है। लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं है। लोकतंत्र निरंतर संवाद है। यदि जनता और प्रशासन के बीच संवाद टूटता है, तो अविश्वास पैदा होता है। और जब अविश्वास बढ़ता है तो समाज वैकल्पिक नेतृत्व खोजने लगता है।
सोशल मीडिया ने बनाई नई जनभावना
पिछले दशक में सोशल मीडिया ने नेतृत्व की परिभाषा बदल दी है। अब किसी व्यक्ति को लोकप्रिय होने के लिए राजनीतिक दल की आवश्यकता नहीं होती। एक मोबाइल फोन और कुछ वायरल वीडियो उसे लाखों लोगों तक पहुंचा सकते हैं। भरत तिवारी के मामले में भी सोशल मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लोगों ने उन्हें अपने नजरिए से देखा। किसी ने उन्हें संघर्ष का प्रतीक बताया।
किसी ने व्यवस्था से लड़ने वाला व्यक्ति कहा। किसी ने कानून तोड़ने वाला बताया। यानी एक ही व्यक्ति की कई छवियां बन गईं।
कानून और जनभावना के बीच संघर्ष
कानून का काम तथ्यों के आधार पर निर्णय करना है। जनभावना का आधार भावनाएं होती हैं। इसलिए दोनों हमेशा एक जैसे नहीं होते। कई बार कोई व्यक्ति कानूनी रूप से दोषी हो सकता है लेकिन समाज का एक वर्ग उसे नायक मानता है। और कई बार कोई व्यक्ति कानूनी रूप से निर्दोष होते हुए भी सामाजिक आलोचना का शिकार हो जाता है। भरत तिवारी का मामला भी इसी श्रेणी में दिखाई देता है।
क्या हिंसा कभी समाधान हो सकती है?
लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि हिंसा किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होती। हथियार उठाना चाहे किसी भी उद्देश्य से हो, अंततः वह समाज को और अधिक तनाव की ओर ले जाता है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब कोई व्यक्ति इस रास्ते पर पहुंचता है तो उसके पीछे लंबे समय का असंतोष मौजूद होता है। इसलिए केवल घटना को देखकर निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं है। घटना के कारणों को समझना भी आवश्यक है।
नौकरशाही और राजनीति के लिए सबक
भरत तिवारी की मौत एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उस दूरी की कहानी भी है जो कई बार जनता और सत्ता के बीच पैदा हो जाती है। यदि किसी क्षेत्र में लोग यह महसूस करने लगें कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही, तो असंतोष बढ़ता है। इसलिए प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल योजनाएं लागू करना नहीं बल्कि लोगों को यह एहसास दिलाना भी है कि उनकी आवाज सुनी जा रही है।
भरत तिवारी होने के मायने
भरत तिवारी होना केवल एक नाम नहीं है। यह एक मानसिक स्थिति का प्रतीक भी हो सकता है। ऐसी मानसिक स्थिति जिसमें व्यक्ति खुद को समाज की लड़ाई का योद्धा समझने लगता है। जहां व्यक्तिगत जीवन पीछे छूट जाता है और संघर्ष ही पहचान बन जाता है। ऐसे लोग इतिहास में बहुत कम पैदा होते हैं। कुछ समाज सुधारक बनते हैं। कुछ क्रांतिकारी कहलाते हैं। कुछ व्यवस्था से टकराकर विवादों में घिर जाते हैं। और कुछ अपने पीछे ऐसे सवाल छोड़ जाते हैं जिनका जवाब वर्षों तक नहीं मिलता।
एक मौत, जो बहस बन गई
भरत तिवारी की मौत का अंतिम मूल्यांकन इतिहास करेगा। कानून अपने निष्कर्ष देगा। जांच एजेंसियां अपने तथ्य प्रस्तुत करेंगी। ले न एक तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि उनकी मृत्यु ने समाज के भीतर मौजूद कई प्रश्नों को सतह पर ला दिया है। लोकतंत्र की सफलता केवल इस बात में नहीं है कि कानून का शासन कायम रहे, बल्कि इस बात में भी है कि नागरिकों को यह भरोसा बना रहे कि उनकी बात सुनी जाएगी। यदि कोई व्यक्ति हथियार उठाने तक पहुंच जाता है, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत विफलता नहीं बल्कि संवाद तंत्र की कमजोरी का संकेत भी हो सकता है।
भरत तिवारी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके नाम पर उठ रहे सवाल आने वाले समय में भी चर्चा का विषय बने रहेंगे।
