नोएडा । पिछले दिनों ‘ए टाइटन स्टोरी’ देखी। गज़ब की कथा, पटकथा, अभिनय, कैमरावर्क और निर्देशन। एकबार शुरू किया, तो देखता ही चला गया। ओटीटी के कूड़े-कबाड़ से भी कभी-कदा उम्मीद की हरियाली चमक जाती है।
हालांकि, मैं यहां इस सीरीज की समीक्षा करने की मंशा से आपसे मुखातिब नहीं हूं। इस शृंखला के साथ उन लम्हों में जीते हुए मन में ख्याल उभरा। जेआरडी टाटा और उनके साथियों ने जब यह सपना संजोया था, तब भारत ‘विकासशील’ देश था।
उन दिनों इस विकासशीलता और अपनी तथाकथित गुट निरपेक्षता पर हम कितना भी इठलाते हों, लेकिन अमीर देशों में हिंदुस्तान को सपेरों, लंबे घने केशों वाली औरतों और हाथियों का देश कहा जाता था। वे समाजवादी सोच के दिन हुआ करते थे, जब सरकार बैंकों, स्कूल, कॉलेजों और महाकाय उद्योगों पर अपना शिकंजा कसे रखना चाहती थी। ऐसे में सरकारी एचएमटी के सामने देश में घड़ी बनाने का स्वप्न सिर्फ टाटा देख सकते थे।
तब से अब तक समय लंबी दूरी तय कर चुका है।
उन दिनों इंटरनेट, मोबाइल फोन, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसे शब्द डिक्शनरी में नहीं होते थे, आज ये हमारे जीवन का हिस्सा हैं। भारतीय उद्योगपतियों ने भी संपदा , सफलता और सामर्थ्य के तमाम कीर्तिमान स्थापित किए हैं।संसार के अमीरतम दस लोगों की सूची में भारतीय उद्योगपतियों के नाम भी दर्ज हैं लेकिन हमारी कोई एआई गाथा क्यों नहीं है? माइक्रोचिप्स के मामले में अभी भी हम आत्मनिर्भर क्यों नहीं हैं? रक्षा के मामले में परनिर्भरता कब तक हमें परेशान करती रहेगी?
सरकार अब शिकंजा नहीं कसती बल्कि सहयोग करती है, ऐसे में तब कोई बड़ा स्वप्न देखने में बुराई क्या है? इस बदले दौर में यह निहायत जरूरी हो गया है कि हमारे उद्योगपति कमर कसें और बड़े ख्वाब बुनें।टाइटन के वक्त में टाटा अकेले थे, आज पूरा देश उनके साथ होगा।
एक अफ्रीकी लोककथा से बात खत्म करता हूं- जब तक हिरण खुद शिकार करना नहीं सीखेंगें,तब तक उनके वंशज शिकारियों की वीरगाथाएं गाते रहेंगे।
हम आखेटक भले न बनें पर हमारा आखेट तो न हो।
आभार : श्री शशि शेखर (प्रधान संपादक, हिंदुस्तान) की आधिकारिक फेसबुक वॉल।
