नई दिल्ली [TV 47 न्यूज नेटवर्क ]। भारत में पिछले कुछ महीनों से फॉर्म-6 राष्ट्रीय बहस का विषय बना हुआ है। विपक्ष चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है। चुनाव आयोग अपने फैसलों का बचाव कर रहा है। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। ऐसे में आम मतदाता के मन में सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर फॉर्म-6 क्या है और इसे लेकर इतना विवाद क्यों हो रहा है?
सबसे पहले समझिए फॉर्म-6 क्या है?
फॉर्म-6 वह आधिकारिक आवेदन पत्र है जिसके माध्यम से कोई भी पात्र भारतीय नागरिक पहली बार अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज कराता है। यदि कोई व्यक्ति 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है या जल्द करने वाला है तो वह इस फॉर्म के जरिए वोटर सूची में शामिल होने के लिए आवेदन कर सकता है। इसके अलावा यदि कोई व्यक्ति एक निर्वाचन क्षेत्र से दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में स्थायी रूप से स्थानांतरित होता है, तब भी उसे नए क्षेत्र में नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 भरना पड़ता है।
सरल शब्दों में कहें तो फॉर्म-6 भारतीय लोकतंत्र में प्रवेश का दरवाजा है।
फॉर्म-6 की कानूनी पृष्ठभूमि क्या है?
फॉर्म-6 कोई नया दस्तावेज नहीं है। यह Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित वैधानिक फॉर्म है। चुनाव आयोग वर्षों से इसी फॉर्म के माध्यम से नए मतदाताओं का पंजीकरण करता रहा है।
मतदाता सूची में नाम जोड़ने की पूरी प्रक्रिया इसी फॉर्म के आधार पर संचालित होती है।
फॉर्म-6 भरने पर कौन-कौन सी जानकारी देनी होती है?
सामान्य रूप से आवेदक को निम्न जानकारी देनी होती है:
- नाम
- आयु और जन्मतिथि
- पता
- लिंग
- परिवार के सदस्य की जानकारी
- पहचान से जुड़े दस्तावेज
- निवास प्रमाण
इसके आधार पर निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) आवेदन की जांच करता है।
फॉर्म-6 अचानक विवादों में क्यों आया?
विवाद का मूल कारण फॉर्म-6 नहीं बल्कि उसके साथ जोड़ी गई अतिरिक्त घोषणा (Declaration) है।
Special Intensive Revision (SIR) के दौरान कुछ राज्यों में ऑनलाइन प्रणाली के माध्यम से एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई। इस घोषणा में आवेदकों से यह जानकारी मांगी गई कि उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पहले की मतदाता सूची अथवा SIR रिकॉर्ड में दर्ज था या नहीं। इसी अतिरिक्त घोषणा ने विवाद खड़ा कर दिया।
विपक्ष की मुख्य आपत्ति क्या है?
विपक्ष का कहना है कि:
1. नए मतदाताओं पर अतिरिक्त बोझ डाला गया
कई युवाओं को अपने माता-पिता या दादा-दादी के पुराने निर्वाचन रिकॉर्ड की जानकारी नहीं होती। ऐसे में अतिरिक्त घोषणा भरना कठिन हो सकता है।
2. वैधानिक फॉर्म में बदलाव का अधिकार किसे?
विपक्ष और कुछ कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि फॉर्म-6 एक वैधानिक दस्तावेज है। इसमें किसी भी प्रकार का बदलाव नियमों में संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता।
3. इससे मतदाता पंजीकरण प्रभावित हो सकता है
विपक्ष का दावा है कि अतिरिक्त शर्तें नए मतदाताओं के लिए बाधा बन सकती हैं और मतदाता सूची में नाम जुड़वाना कठिन हो सकता है।
क्या विपक्ष की आपत्ति पूरी तरह सही है?
इस प्रश्न का उत्तर सीधा “हां” या “नहीं” में नहीं है।
जहां विपक्ष की दलील मजबूत दिखती है
- अतिरिक्त घोषणा को लेकर कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठे।
- सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर स्पष्टीकरण मांगा।
- चुनाव आयोग के भीतर भी कथित मतभेदों की खबरें सामने आईं।
जहां विपक्ष का दावा पूरी तरह सिद्ध नहीं हुआ
- अभी तक किसी अदालत ने यह नहीं कहा है कि पूरी प्रक्रिया अवैध थी।
- चुनाव आयोग का कहना है कि मूल फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया।
- आयोग का दावा है कि केवल एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी।
इसलिए अंतिम निष्कर्ष अभी न्यायिक जांच और चुनाव आयोग की रिपोर्ट पर निर्भर करेगा।
चुनाव आयोग का क्या दावा है?
चुनाव आयोग का कहना है कि:
- मूल फॉर्म-6 में एक भी शब्द नहीं बदला गया।
- केवल SIR प्रक्रिया के लिए एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी।
- इसका उद्देश्य पात्र और अपात्र मतदाताओं की पहचान में मदद करना था।
- मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
आयोग का तर्क है कि यह प्रक्रिया चुनावी पारदर्शिता और मतदाता सूची की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए की गई।
सरकार का क्या पक्ष है?
सरकार और सत्ता पक्ष का कहना है कि:
- फर्जी और डुप्लीकेट प्रविष्टियां हटाना आवश्यक है।
- पात्र नागरिकों का अधिकार सुरक्षित रहेगा।
- मतदाता सूची को अद्यतन रखना लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है।
- विपक्ष अनावश्यक राजनीतिक विवाद पैदा कर रहा है।
सत्ता पक्ष का मानना है कि SIR और उससे जुड़ी प्रक्रियाएं चुनावी सुधारों का हिस्सा हैं।
फॉर्म-6 की प्रेरणा कहां से मिली?
फॉर्म-6 की अवधारणा भारत की निर्वाचन प्रणाली से जुड़ी है और इसकी जड़ें Representation of the People Act, 1950 तथा Registration of Electors Rules, 1960 में हैं।
इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदाता सूची में शामिल होने का अवसर मिले। लोकतांत्रिक देशों में मतदाता पंजीकरण के लिए अलग-अलग प्रकार के आवेदन पत्र होते हैं। भारत में यह भूमिका फॉर्म-6 निभाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियां इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 में किए गए किसी संशोधन को मंजूरी नहीं दी थी। अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड की जांच की जाएगी और यह देखा जाएगा कि बदलाव किसने और किस अधिकार से किए।
सुप्रीम कोर्ट ने किस प्रावधान पर सवाल उठाया?
कोर्ट की चिंता मुख्य रूप से उस अतिरिक्त घोषणा को लेकर रही जिसमें आवेदकों से यह बताने को कहा गया था कि:
- उनका नाम पुराने रिकॉर्ड में था या नहीं,
- अथवा उनके माता-पिता/दादा-दादी का नाम पहले की मतदाता सूची में था या नहीं।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह अतिरिक्त शर्त मूल वैधानिक फॉर्म का हिस्सा नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसी बिंदु पर चुनाव आयोग से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
बाद में क्या बदलाव हुए?
विवाद बढ़ने के बाद चुनाव आयोग ने कई स्थानों पर उस अतिरिक्त घोषणा को हटाने या सीमित करने का फैसला किया। बाद में यह भी स्पष्ट किया गया कि नए मतदाताओं को अपने माता-पिता या दादा-दादी के पुराने रिकॉर्ड की जानकारी देना अनिवार्य नहीं रहेगा।
लोकतंत्र के लिए यह विवाद क्यों महत्वपूर्ण है?
फॉर्म-6 केवल एक आवेदन पत्र नहीं है।
यह सीधे तौर पर:
- मतदान के अधिकार,
- मतदाता सूची की शुद्धता,
- चुनाव आयोग की विश्वसनीयता,
- और लोकतांत्रिक भागीदारी
से जुड़ा हुआ है।
यदि मतदाता सूची में फर्जी नाम रहते हैं तो चुनाव प्रभावित हो सकता है। यदि पात्र नागरिकों का पंजीकरण कठिन हो
