प्रयागराज [TV 47 न्यूज नेटवर्क ]। प्रयागराज की मेजा तहसील में वकीलों की हड़ताल का असर अब आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भारी पड़ने लगा है। जिन लोगों के जमीन, राजस्व, प्रमाणपत्र और दूसरे जरूरी काम तहसील में अटके हैं, वे लगातार परेशान हो रहे हैं। कई लोग रोज तहसील पहुंचते हैं, लेकिन काम नहीं होने के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ता है। 87 वर्षीय राजनाथ की परेशानी इस संकट की एक बड़ी तस्वीर पेश करती है। उनका कहना है कि वह रोज तहसील का चक्कर लगाते हैं, लेकिन हर बार यही जवाब मिलता है कि अभी हड़ताल खत्म नहीं हुई है।
मेजा के लोगों की मांग है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मामले में हस्तक्षेप करें, ताकि हड़ताल का समाधान निकले और आम जनता को राहत मिल सके। सवाल यह है कि वकीलों और प्रशासन के बीच चल रहे विवाद की कीमत आखिर आम नागरिक कब तक चुकाते रहेंगे?
मेजा तहसील में वकीलों की हड़ताल को लेकर सामने आ रही शिकायतें केवल अदालत और अधिवक्ताओं के बीच का मामला नहीं हैं। इसका सीधा असर उन आम नागरिकों पर पड़ रहा है, जिनके जरूरी काम तहसील में अटके हुए हैं। बुजुर्ग, किसान, महिलाएं और दूर-दराज के गांवों से आने वाले लोग रोज उम्मीद लेकर तहसील पहुंचते हैं। लेकिन काम न होने पर उन्हें निराश होकर लौटना पड़ता है।
87 वर्षीय राजनाथ की परेशानी इस व्यवस्था की मानवीय तस्वीर सामने लाती है। उनका कहना है कि वह रोज तहसील का चक्कर लगाते हैं। हर बार उन्हें यही कहकर वापस कर दिया जाता है कि अभी हड़ताल खत्म नहीं हुई है। उम्र के इस पड़ाव पर बार-बार तहसील पहुंचना उनके लिए आसान नहीं है। ऐसे में उनकी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से गुहार है कि इस समस्या का समाधान कराया जाए, ताकि आम लोगों को राहत मिल सके।
रोज तहसील पहुंच रहे लोग, लेकिन नहीं हो रहे काम
मेजा तहसील में हड़ताल के कारण लोगों को किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, इसका अंदाजा यहां पहुंचने वाले फरियादियों की स्थिति से लगाया जा सकता है। कोई जमीन से जुड़े विवाद के निस्तारण के लिए आ रहा है तो किसी को राजस्व अभिलेख की जरूरत है। किसी का प्रमाणपत्र अटका है तो कोई लंबे समय से लंबित प्रकरण में सुनवाई की उम्मीद लगाए बैठा है।
इन लोगों के लिए तहसील केवल एक सरकारी कार्यालय नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जरूरतों और कई बार जीवनभर की जमा-पूंजी से जुड़े मामलों के समाधान का केंद्र है। लेकिन हड़ताल के चलते जब काम आगे नहीं बढ़ता तो उनकी परेशानी बढ़ जाती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वे अपनी समस्या लेकर तहसील पहुंचते हैं, लेकिन वहां से उन्हें वापस लौटना पड़ता है। कई लोगों को यह भी समझ नहीं आता कि उनका काम कब होगा और अगली बार उन्हें कब आना चाहिए। दूर-दराज के गांवों से आने वाले लोगों के लिए यह स्थिति और मुश्किल है। आने-जाने का खर्च, पूरा दिन खराब होना और फिर बिना काम लौटना उनकी परेशानी को कई गुना बढ़ा देता है।
87 साल के राजनाथ की पीड़ा, आखिर कब खत्म होगी हड़ताल?
मेजा तहसील में परेशान लोगों के बीच 87 वर्षीय राजनाथ का मामला खास तौर पर ध्यान खींचता है। राजनाथ का कहना है कि वह रोज तहसील का चक्कर लगाते हैं। उन्हें उम्मीद रहती है कि शायद आज उनका काम हो जाए, लेकिन वहां पहुंचने पर फिर वही जवाब मिलता है कि हड़ताल अभी खत्म नहीं हुई है।
इस उम्र में किसी बुजुर्ग के लिए बार-बार सरकारी दफ्तर पहुंचना आसान नहीं होता। चलने-फिरने में परेशानी हो सकती है। परिवार के किसी सदस्य को साथ लेकर आना पड़ सकता है। इसके बावजूद राजनाथ लगातार तहसील पहुंच रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि आखिर उनका काम कब होगा?
राजनाथ की परेशानी केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है। यह उन तमाम लोगों की स्थिति को सामने लाती है, जिनके जरूरी काम हड़ताल के कारण रुके हुए हैं। इनमें बुजुर्गों के साथ ऐसे लोग भी शामिल हैं, जिन्हें रोजी-रोटी छोड़कर तहसील आना पड़ता है।
स्थानीय लोगों की मांग है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मामले को गंभीरता से लें। प्रशासन और अधिवक्ताओं के बीच बातचीत कराकर कोई ऐसा रास्ता निकाला जाए, जिससे हड़ताल भी समाप्त हो और आम जनता का काम भी शुरू हो सके।
अफसर आते हैं, हाजिरी लगाते हैं और चले जाते हैं?
स्थानीय लोगों की ओर से प्रशासनिक कामकाज को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। लोगों का आरोप है कि अधिकारी तहसील आते हैं, अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और फिर चले जाते हैं। लेकिन आम नागरिकों की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता।
हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना जरूरी है। फिर भी लोगों की शिकायत यह है कि जब तहसील में कामकाज प्रभावित है तो प्रशासन को केवल उपस्थिति तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जरूरी सेवाएं किस तरह जारी रखी जा सकती हैं।
सरकारी कार्यालयों में अधिकारियों की मौजूदगी का असली उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान करना है। यदि कोई विवाद या हड़ताल चल रही है तो प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उसे दोनों पक्षों से बातचीत करनी चाहिए और जनता के हित में वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करनी चाहिए।
मेजा तहसील पर बड़ी आबादी की निर्भरता
प्रयागराज जिले में कुल आठ तहसीलें हैं। इनमें मेजा भी एक महत्वपूर्ण तहसील है। जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार मेजा तहसील के अंतर्गत मेजा, उरुवा और मांडा विकासखंड आते हैं। इसके अंतर्गत कुल 395 गांव दर्ज हैं।
इससे समझा जा सकता है कि मेजा तहसील का कामकाज कितने बड़े ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को प्रभावित करता है। यहां आने वाले लोगों के काम केवल एक तरह के नहीं होते। राजस्व विभाग, जमीन के रिकॉर्ड, नामांतरण, वरासत, प्रमाणपत्र और दूसरे प्रशासनिक मामलों के लिए लोगों को तहसील का रुख करना पड़ता है।
किसान के लिए जमीन से जुड़ा कागज जरूरी हो सकता है। किसी परिवार को विरासत में मिली संपत्ति का नाम दर्ज कराना हो सकता है। किसी विद्यार्थी को दाखिले या छात्रवृत्ति के लिए प्रमाणपत्र चाहिए हो सकता है। किसी व्यक्ति को बैंक, सरकारी योजना या दूसरे विभाग में दस्तावेज जमा करने हों तो उसे तहसील से जारी कागज की जरूरत पड़ सकती है।
ऐसे में कामकाज लंबे समय तक प्रभावित रहने पर उसका असर केवल तहसील परिसर तक सीमित नहीं रहता। गांवों के परिवारों की योजनाएं और जरूरी काम भी रुक जाते हैं।
हड़ताल का असर सबसे ज्यादा गरीब और बुजुर्गों पर
हड़ताल के दौरान सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को होती है, जिनके पास बार-बार तहसील आने के संसाधन नहीं हैं। संपन्न व्यक्ति निजी वाहन से आ सकता है या किसी परिचित की मदद ले सकता है। लेकिन गरीब परिवारों के लिए हर यात्रा का खर्च मायने रखता है।
दिहाड़ी मजदूर को तहसील आने के लिए काम छोड़ना पड़ता है। किसान को खेत का काम रोकना पड़ सकता है। बुजुर्गों को परिवार के किसी सदस्य पर निर्भर रहना पड़ता है। महिलाओं के लिए भी लंबी दूरी तय कर बार-बार सरकारी कार्यालय पहुंचना आसान नहीं होता।
कई बार एक ही काम के लिए लोगों को कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। पहले आवेदन जमा करने, फिर दस्तावेज की कमी पूरी करने और उसके बाद सुनवाई या सत्यापन के लिए बुलाया जाता है। यदि इसी बीच हड़ताल हो जाए तो पूरी प्रक्रिया रुक सकती है।
ऐसे मामलों में प्रशासन को यह देखना चाहिए कि किन सेवाओं को जारी रखा जा सकता है। लोगों को स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए कि कौन-से काम फिलहाल हो रहे हैं और किन कामों के लिए इंतजार करना पड़ेगा।
अधिवक्ताओं की मांग और जनता की परेशानी के बीच रास्ता जरूरी
पीड़ितों का कहना है कि किसी भी संगठन को अपनी मांगों और समस्याओं को लेकर विरोध दर्ज कराने का अधिकार है। अधिवक्ता भी अपनी पेशेवर और संस्थागत मांगों को लेकर आंदोलन कर सकते हैं। लेकिन किसी भी आंदोलन के दौरान आम जनता के हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
यह भी जरूरी है कि हड़ताल के पीछे अधिवक्ताओं की वास्तविक मांगों और विवाद के कारणों को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाए। इससे लोगों को पता चलेगा कि आंदोलन किस मुद्दे पर है और समाधान के लिए क्या बातचीत चल रही है।
पीड़ितों का कहना है कि प्रशासन की भूमिका यहां सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। उसे अधिवक्ताओं के प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर विवाद की जड़ तक पहुंचना चाहिए। यदि किसी अधिकारी या व्यवस्था से जुड़ी शिकायत है तो उसकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। यदि कोई मांग शासन स्तर पर लंबित है तो उसे संबंधित विभाग तक पहुंचाया जाना चाहिए।
बातचीत का उद्देश्य केवल हड़ताल समाप्त कराना नहीं, बल्कि ऐसा समाधान निकालना होना चाहिए जिससे भविष्य में इस तरह की स्थिति दोबारा पैदा न हो।
प्रशासन वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं कर सकता?
हड़ताल के दौरान यह सवाल भी उठता है कि क्या प्रशासन आम नागरिकों के जरूरी कामों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था कर सकता है? कई प्रशासनिक सेवाएं ऐसी होती हैं, जिनके लिए समयसीमा महत्वपूर्ण होती है। प्रमाणपत्र, राजस्व संबंधी आवेदन और अन्य जरूरी कार्यों में देरी से लोगों को आर्थिक या शैक्षणिक नुकसान हो सकता है।
प्रशासन को कम से कम यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लोगों के आवेदन स्वीकार करने, उनकी स्थिति बताने और जरूरी सूचनाएं उपलब्ध कराने का काम बंद न हो। जिन मामलों में तत्काल कार्रवाई संभव नहीं है, उनमें आवेदकों को लिखित या डिजिटल माध्यम से स्थिति की जानकारी दी जा सकती है।
तहसील परिसर में सूचना बोर्ड लगाया जा सकता है। हेल्प डेस्क के माध्यम से लोगों को बताया जा सकता है कि कौन-से काम हो रहे हैं और कौन-से लंबित हैं। बुजुर्गों, दिव्यांगों और दूर से आने वाले लोगों के लिए विशेष सहायता की व्यवस्था भी की जा सकती है। इससे कम से कम लोगों को रोज तहसील के चक्कर लगाने से राहत मिलेगी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मेजा के लोगों की गुहार
मेजा के लोगों की सबसे बड़ी मांग है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस मामले में हस्तक्षेप करें। लोगों का कहना है कि तहसील में कामकाज प्रभावित होने से उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पर असर पड़ रहा है। ऐसे में सरकार और जिला प्रशासन को जल्द समाधान निकालना चाहिए।
मुख्यमंत्री के स्तर से जिला प्रशासन को निर्देश दिए जा सकते हैं कि वह अधिवक्ताओं के प्रतिनिधियों से बातचीत करे और विवाद को खत्म कराने की पहल करे। जरूरत पड़ने पर मंडल या शासन स्तर के अधिकारियों को भी बातचीत में शामिल किया जा सकता है।
साथ ही, प्रशासन को आम जनता के लिए जवाबदेही तय करनी होगी। लोगों को यह पता होना चाहिए कि उनके आवेदन किस स्थिति में हैं और काम कब तक पूरा हो सकता है। केवल यह कह देना कि हड़ताल चल रही है, किसी फरियादी की समस्या का समाधान नहीं है।
87 वर्षीय राजनाथ जैसे बुजुर्गों की परेशानी को देखते हुए प्राथमिकता के आधार पर जरूरी मामलों का निस्तारण किया जाना चाहिए। प्रशासन चाहे तो ऐसे लोगों की सूची तैयार कर विशेष सहायता उपलब्ध करा सकता है।
कब खत्म होगी हड़ताल, लोगों को जवाब का इंतजार
मेजा तहसील के लोगों के सामने इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि हड़ताल कब खत्म होगी और उनका रुका हुआ काम कब शुरू होगा। रोज तहसील पहुंचने वाले लोगों को किसी निश्चित तारीख या समाधान का इंतजार है।
यह मामला केवल अधिवक्ताओं और प्रशासन के बीच बातचीत तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसमें उन लोगों की परेशानी को भी शामिल किया जाना चाहिए, जिनका इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन वे इसकी वजह से परेशान हो रहे हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और आंदोलन की जगह है, लेकिन आम नागरिकों को बुनियादी प्रशासनिक सेवाओं से लंबे समय तक वंचित नहीं रखा जाना चाहिए। मेजा के लोगों की मांग भी यही है कि विवाद का सम्मानजनक समाधान निकले और तहसील का कामकाज सामान्य हो।
राजनाथ जैसे बुजुर्गों को अब रोज तहसील के चक्कर न लगाने पड़ें। किसानों को अपने कागजों के लिए भटकना न पड़े। गरीब परिवारों का समय और पैसा बर्बाद न हो। यही वह अपेक्षा है, जिसके साथ मेजा के लोग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रयागराज जिला प्रशासन की ओर देख रहे हैं।
