लखनऊ [TV 47 न्यूज नेटवर्क ]। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले प्रदेश की सियासत गरमा गई है। लखनऊ में भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार को कोई हिला नहीं सकता। उन्होंने भाजपा की राजनीतिक स्थिति की तुलना रामायण के अंगद के पैर से की और कहा कि 2027 में पार्टी लगातार तीसरी बार सरकार बनाएगी। शाह ने कार्यकर्ताओं को अर्जुन की तरह मछली की आंख पर निशाना साधने की सलाह दी। साथ ही समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पर तीखे हमले किए। दूसरी ओर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अमित शाह के लखनऊ दौरे और भाजपा के समान नागरिक संहिता (UCC) के वादे पर तंज कसा। उन्होंने कहा- ‘बड़ी देर कर दी मेहरबां आते-आते।’ आखिर अमित शाह ने अपने भाषण में क्या कहा और अखिलेश यादव ने किस तरह जवाब दिया?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। भाजपा जहां तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर संगठन को सक्रिय कर रही है, वहीं समाजवादी पार्टी पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) राजनीति के सहारे सत्ता में वापसी की रणनीति बना रही है।
30 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में आयोजित भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में अमित शाह का भाषण इसी चुनावी रणनीति का बड़ा संकेत माना जा रहा है। शाह ने एक तरफ कार्यकर्ताओं में जोश भरा, दूसरी तरफ अखिलेश यादव और कांग्रेस को सीधे निशाने पर लिया। उन्होंने अयोध्या की 1990 की घटना, राम मंदिर, कानून-व्यवस्था, निवेश और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को भी उठाया।
1. अमित शाह ने भाजपा को बताया अंगद का पैर, कहा- कोई हिला नहीं सकता
लखनऊ में भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में अमित शाह का सबसे चर्चित बयान भाजपा की राजनीतिक स्थिति को लेकर रहा।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का पैर अंगद के पैर की तरह जम चुका है। इसे कोई हिला नहीं सकता। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि उन्हें 2027 के विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार भाजपा की सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ काम करना है।
अंगद का उदाहरण रामायण से जुड़ा है। रामायण के अनुसार, जब अंगद रावण के दरबार में शांति का संदेश लेकर पहुंचे थे, तब उन्होंने अपना पैर जमीन पर जमा दिया था। उन्होंने चुनौती दी थी कि यदि कोई उनका पैर हटा दे तो वे हार मान लेंगे। रावण के दरबार में मौजूद योद्धा ऐसा नहीं कर सके।
अमित शाह ने इसी प्रसंग के माध्यम से भाजपा की संगठनात्मक मजबूती का दावा किया।
उनका संदेश साफ था कि पार्टी को अपनी जीत को लेकर आत्मविश्वास रखना चाहिए, लेकिन केवल दावों से चुनाव नहीं जीता जा सकता। इसके लिए बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करना होगा।
2. अर्जुन की तरह मछली की आंख पर निशाना लगाने की सलाह
अमित शाह ने भाजपा कार्यकर्ताओं को महाभारत के अर्जुन का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह अर्जुन ने मछली की आंख पर निशाना साधा था, उसी तरह कार्यकर्ताओं का पूरा ध्यान 2027 के विधानसभा चुनाव में जीत पर होना चाहिए।
शाह के मुताबिक, पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने व्यक्तिगत पद, प्रतिष्ठा और महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर संगठन के लिए काम करना होगा।
उन्होंने कहा कि भाजपा की जीत किसी एक नेता के कारण नहीं होती, बल्कि उसके पीछे बूथ स्तर पर काम करने वाले हजारों कार्यकर्ताओं की मेहनत होती है।
शाह ने कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे चुनाव तक लगातार मेहनत करें और जनता के बीच सरकार की उपलब्धियां लेकर जाएं।
यह संदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा के भीतर कार्यकर्ताओं की नाराजगी और संगठन तथा सरकार के बीच समन्वय को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
3. गोमती में बहा दीजिए नाराजगी, शाह ने कार्यकर्ताओं को क्यों दी यह सलाह?
अमित शाह ने अपने भाषण में भाजपा के भीतर मौजूद असंतोष का भी उल्लेख किया। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि उनके मन में जो नाराजगी, निराशा या शिकायत है, उसे गोमती नदी में बहाकर चुनाव की तैयारी में जुट जाएं।
शाह ने स्वीकार किया कि कई कार्यकर्ताओं की इच्छा कुछ और पद पाने की रही होगी। कोई मंत्री बनना चाहता था, किसी को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी की उम्मीद थी, लेकिन सभी की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकतीं।
उन्होंने कहा कि भाजपा ने उत्तर प्रदेश में कार्यकर्ताओं को अधिक से अधिक समायोजित करने का प्रयास किया है। पार्टी की जीत व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से बड़ी है।
यह बयान राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। दरअसल, भाजपा में पिछले कुछ समय से संगठन और सरकार के बीच तालमेल, कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और पदों के बंटवारे को लेकर असंतोष की चर्चा रही है। हाल के विधान परिषद चुनावों में सपा के बेहतर प्रदर्शन के बाद भी भाजपा के अंदर आत्ममंथन की जरूरत महसूस की जा रही है। अमित शाह ने इसी पृष्ठभूमि में कार्यकर्ताओं को एकजुट रहने का संदेश दिया।
4. अखिलेश यादव पर सीधा हमला, 30 साल तक सत्ता से दूर रहने की भविष्यवाणी
अमित शाह ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को सीधे निशाने पर लिया। उन्होंने सवाल उठाया कि अखिलेश यादव किस आधार पर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं।
शाह ने कहा कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की राजनीति नकारात्मक आरोपों पर आधारित है। उन्होंने अखिलेश यादव को संबोधित करते हुए दावा किया कि सपा अगले 30 वर्षों तक उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापस नहीं आएगी।
उन्होंने यह भी कहा कि जनता अखिलेश यादव की तीसरी पीढ़ी को भी माफ नहीं करेगी। यह बयान 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की रणनीति को दिखाता है। भाजपा सपा को केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में नहीं, बल्कि अपने पुराने शासन और कानून-व्यवस्था के सवालों के आधार पर घेरना चाहती है।
शाह ने सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के शासनकाल की घटनाओं को भी अपने भाषण का हिस्सा बनाया।
5. 30 अक्टूबर 1990 की अयोध्या गोलीकांड की याद दिलाकर सपा को घेरा
अमित शाह ने अपने भाषण में 30 अक्टूबर 1990 की घटना का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इसी दिन अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर गोली चलाई गई थी।
उस समय उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। भाजपा लंबे समय से इस घटना को सपा के खिलाफ अपने राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाती रही है।
अमित शाह ने अखिलेश यादव से सवाल किया कि जिस पार्टी की सरकार में रामभक्तों पर गोली चली, वह किस आधार पर दोबारा सरकार बनाने की बात करती है।
उन्होंने भाजपा और सपा की राजनीति के बीच अंतर बताते हुए कहा कि एक तरफ सपा सरकार के दौरान गोली चली थी, दूसरी तरफ भाजपा के शासनकाल में अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हुआ।
शाह ने पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कल्याण सिंह ने राम मंदिर आंदोलन के दौरान सरकार जाने की चिंता किए बिना अपना राजनीतिक निर्णय लिया था।
इस बयान का राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट है। भाजपा 2027 के चुनाव में अयोध्या और राम मंदिर के मुद्दे को एक बार फिर सपा के खिलाफ राजनीतिक विमर्श में शामिल करना चाहती है।
हालांकि, अयोध्या की 1990 की घटना को लेकर दोनों दलों की राजनीतिक व्याख्या अलग-अलग रही है। ऐसे में यह मुद्दा आने वाले चुनाव में भी चर्चा के केंद्र में रह सकता है।
6. भाजपा की सरकार बनी तो यूपी में लागू होगा UCC
अमित शाह के भाषण की एक बड़ी घोषणा समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लेकर रही। उन्होंने कहा कि अगर भाजपा 2027 में उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सरकार बनाती है तो राज्य में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी।
इस घोषणा के साथ भाजपा ने चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण वैचारिक मुद्दा सामने रख दिया है। समान नागरिक संहिता का अर्थ है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत नागरिक मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी प्रावधान हों। वर्तमान में भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत कानून लागू हैं।
भाजपा लंबे समय से समान नागरिक संहिता की समर्थक रही है। उत्तराखंड में इसे लागू किए जाने के बाद अब उत्तर प्रदेश को लेकर अमित शाह की घोषणा महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
इस मुद्दे के कई राजनीतिक मायने हैं। भाजपा इसे समानता और लैंगिक न्याय से जोड़कर प्रस्तुत करती है। दूसरी तरफ विपक्ष इसके संभावित स्वरूप, धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक प्रभाव को लेकर सवाल उठाता रहा है।
इसलिए 2027 के चुनाव में UCC का मुद्दा भाजपा और विपक्ष के बीच वैचारिक बहस को और तेज कर सकता है।
7. अखिलेश यादव का पलटवार- ‘बड़ी देर कर दी मेहरबां आते-आते’
यह टिप्पणी अपने आप में भाजपा के लिए एक राजनीतिक सवाल थी। अखिलेश यादव का इशारा इस बात की तरफ था कि भाजपा उत्तर प्रदेश में लगातार दो बार सरकार बना चुकी है। ऐसे में अगर समान नागरिक संहिता लागू करनी थी तो इसके लिए पहले ही कदम क्यों नहीं उठाया गया?
उन्होंने चुनाव से ठीक पहले इस घोषणा को उठाए जाने के समय पर सवाल खड़ा किया। जब एक पत्रकार ने उनके गाने के बोल में सुधार करते हुए कहा कि मूल गीत में ‘मेहरबां’ की जगह ‘हुजूर’ शब्द आता है तो अखिलेश ने मुस्कराते हुए जवाब दिया कि उन्हें ‘हुजूर’ न कहलवाया जाए, ‘मेहरबां’ ही ठीक है।
अखिलेश का यह जवाब राजनीतिक कटाक्ष के साथ हल्के-फुल्के अंदाज में दिया गया, लेकिन इसके पीछे भाजपा की दो कार्यकाल की सरकार पर सवाल उठाने की रणनीति साफ दिखाई देती है।
8. अमित शाह के लखनऊ दौरे पर भी अखिलेश का तंज
अखिलेश यादव ने केवल UCC के मुद्दे पर ही नहीं, बल्कि अमित शाह के लखनऊ दौरे पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर ‘बड़ी देर कर दी मेहरबां आते-आते’ लिखकर भाजपा की चुनावी सक्रियता पर सवाल उठाया।
अखिलेश यादव ने विधान परिषद चुनाव के नतीजों का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि भाजपा के लिए इन चुनावों के परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहे।
हालिया 11 विधान परिषद शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव में भाजपा ने छह सीटें बरकरार रखीं, जबकि समाजवादी पार्टी ने अपनी सीटों की संख्या तीन से बढ़ाकर पांच कर ली।
सपा ने इसे भाजपा के खिलाफ अपने राजनीतिक विस्तार के संकेत के तौर पर पेश किया। अखिलेश यादव की रणनीति यह है कि भाजपा को उसके दो कार्यकाल के कामकाज पर जवाब देना पड़े। वह बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक न्याय और पीडीए के सवालों को चुनावी बहस में प्रमुखता देना चाहते हैं।
9. वोट चोरी के आरोप पर अमित शाह की चुनौती, संसद में बहस का प्रस्ताव
अमित शाह ने अपने भाषण में चुनाव आयोग और वोट चोरी के आरोपों पर भी विपक्ष को घेरा। उन्होंने कहा कि चुनाव हारने के बाद विपक्ष अंपायर पर आरोप लगाने लगता है। उन्होंने क्रिकेट मैच का उदाहरण देते हुए कहा कि हारने वाली टीम अंपायर को दोष देने लगती है।
शाह ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं को चुनौती दी कि वे संसद में इस मुद्दे पर चर्चा करें। उन्होंने कहा कि भाजपा संसद में विशेष सत्र बुलाने के लिए भी तैयार है और विपक्ष के हर सवाल का जवाब देने को तैयार है।
इस बयान के जरिए शाह ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और चुनाव प्रक्रिया को लेकर विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की कोशिश की।
विपक्ष की ओर से मतदाता सूची में गड़बड़ी और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। भाजपा इन आरोपों को राजनीतिक हार की निराशा बताती है। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच टकराव 2027 के चुनाव से पहले और बढ़ सकता है।
10. योगी सरकार की तारीफ, कानून-व्यवस्था और निवेश को बनाया चुनावी मुद्दा
अमित शाह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की खुलकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश को माफिया से मुक्त कराने और कानून-व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए काम किया है।
शाह के मुताबिक, भाजपा सरकार के कार्यकाल में लूट, डकैती, रंगदारी और दंगों की घटनाओं में कमी आई है। उन्होंने कहा कि बेहतर कानून-व्यवस्था के कारण उत्तर प्रदेश निवेश के लिए आकर्षक राज्य बना है।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से उत्तर प्रदेश को मिलने वाले आर्थिक सहयोग और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से योजनाओं के क्रियान्वयन का भी उल्लेख किया।
शाह ने दावा किया कि राज्य में करीब 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव आए हैं और इनमें से लगभग 15 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएं जमीन पर उतारी जा चुकी हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में विकास की रफ्तार सपा और बसपा सरकारों के संयुक्त कार्यकाल से अधिक रही है।
इन आंकड़ों को निवेश प्रस्तावों और वास्तविक निवेश के अंतर के साथ समझना जरूरी है। निवेश प्रस्ताव का अर्थ यह नहीं होता कि पूरी राशि खर्च हो चुकी है या सभी परियोजनाएं उत्पादन शुरू कर चुकी हैं।
भाजपा के लिए 2027 में कानून-व्यवस्था और निवेश बड़े चुनावी मुद्दे होंगे। वहीं विपक्ष इन दावों के सामने रोजगार, किसानों की आय, महंगाई और स्थानीय विकास के सवाल रख सकता है।
11. 2027 के चुनाव में भाजपा और सपा की रणनीति में क्या है अंतर?
अमित शाह के भाषण और अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया से उत्तर प्रदेश की दो प्रमुख राजनीतिक रणनीतियां सामने आती हैं।
| भाजपा की रणनीति | सपा की रणनीति |
|---|---|
| योगी सरकार के कामकाज को प्रमुखता | सरकार के दो कार्यकाल पर सवाल |
| राम मंदिर और अयोध्या का मुद्दा | पीडीए और सामाजिक न्याय |
| कानून-व्यवस्था और निवेश | रोजगार और महंगाई |
| UCC और वैचारिक मुद्दे | UCC की घोषणा के समय पर सवाल |
| बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करना | विपक्षी एकजुटता और सामाजिक समीकरण |
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने की है। पार्टी को सरकार के कामकाज के साथ कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी दूर करनी होगी।
दूसरी तरफ सपा के लिए चुनौती यह है कि वह अपने 2024 लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को विधानसभा चुनाव में भी दोहरा सके। इसके लिए उसे पीडीए के सामाजिक समीकरण को मजबूत करने के साथ अन्य वर्गों में भी अपना जनाधार बढ़ाना होगा।
2027 का मुकाबला केवल भाजपा और सपा के बीच नहीं होगा। कांग्रेस, बसपा और अन्य राजनीतिक दलों की भूमिका भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।
अंगद के पैर का दावा बनाम अखिलेश का राजनीतिक कटाक्ष
अमित शाह के लखनऊ दौरे ने उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात को और गर्म कर दिया है। भाजपा ने तीसरी बार सत्ता में वापसी का दावा करते हुए कार्यकर्ताओं को चुनावी मोड में आने का संदेश दिया है।
अंगद के पैर का उदाहरण देकर अमित शाह ने भाजपा की मजबूती दिखाई, जबकि UCC की घोषणा से चुनावी बहस को नया मुद्दा दिया। दूसरी तरफ अखिलेश यादव ने ‘बड़ी देर कर दी मेहरबां आते-आते’ कहकर भाजपा की दो कार्यकाल की सरकार पर सवाल खड़े किए।
अब असली मुकाबला इस बात का होगा कि जनता किसे प्राथमिकता देती है। भाजपा का विकास, कानून-व्यवस्था और हिंदुत्व का एजेंडा या सपा का पीडीए, सामाजिक न्याय और सत्ता परिवर्तन का नारा।
इतना तय है कि 2027 का विधानसभा चुनाव आने से पहले ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में भाजपा और सपा के बीच सीधी टक्कर के संकेत दिखाई देने लगे हैं।
