नई दिल्ली [TV 47 न्यूज नेटवर्क ]। फ्रांस में 17 अक्टूबर 2026 को महंगाई, शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर देशव्यापी प्रदर्शन हिंसक झड़पों में बदल गए। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अलग-अलग शहरों में सैकड़ों हजार लोग सड़कों पर उतरे। कई जगह आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं हुईं। प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू ने हिंसा की निंदा की और सरकार को डराने की कोशिश करने वाले उपद्रवी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई का संकेत दिया।
आंदोलन को समझने के लिए पांच अहम सवाल हैं: इसकी तात्कालिक वजह क्या है, मांगें कितनी पुरानी हैं, सरकार क्या कर रही है, हिंसा क्यों बढ़ी और इसका राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार तथा 2027 के चुनाव पर क्या असर पड़ सकता है?
1. आंदोलन की असली वजह क्या है? स्कूलों से शुरू हुआ विरोध देशव्यापी कैसे बना
फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत सितंबर 2026 में पेरिस के दक्षिण-पूर्वी उपनगर क्रेतेई के एक स्कूल से जुड़ी शिकायतों के बाद हुई। 17 सितंबर के आसपास शिक्षकों और कर्मचारियों ने खाली पदों तथा संसाधनों की कमी को लेकर विरोध किया। इसके बाद छात्र भी आंदोलन में शामिल हो गए। कुछ ही दिनों में प्रदर्शन पेरिस के आसपास के इलाकों से निकलकर दूसरे शहरों तक पहुंच गया।
इस आंदोलन में विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। फ्रांस में विश्वविद्यालयों के आवेदन और प्रवेश से जुड़ा Parcoursup सिस्टम लंबे समय से बहस में है। कुछ छात्रों का आरोप है कि इसकी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं है और इससे शैक्षणिक अवसरों की असमानता बढ़ सकती है।
इसके साथ ही बढ़ती महंगाई और कमजोर होती क्रयशक्ति का मुद्दा भी व्यापक प्रदर्शनों में शामिल हो गया। अब आंदोलन केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रहा। इसमें शिक्षक, अभिभावक, छात्र संगठन और श्रमिक संघ भी शामिल हुए हैं। 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों में आर्थिक दबाव और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति प्रमुख मुद्दे रहे।
2. कितनी पुरानी हैं मांगें? 1990 से 2023 तक के आंदोलनों का इतिहास
फ्रांस में शिक्षा, श्रमिक अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा को लेकर विरोध का लंबा इतिहास रहा है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि 2026 का आंदोलन और पहले के आंदोलन एक ही अभियान का हिस्सा नहीं हैं। इनके मुद्दे अलग-अलग रहे हैं, लेकिन इनके पीछे सरकारी नीतियों और सामाजिक असमानता को लेकर असंतोष की समानता दिखाई देती है।
1990 का छात्र आंदोलन: फ्रांस में स्कूलों की स्थिति और शिक्षा के लिए संसाधनों की मांग को लेकर छात्र पहले भी बड़े प्रदर्शन कर चुके हैं। 1990 के आंदोलन के बाद तत्कालीन शिक्षा मंत्री लियोनेल जोस्पां ने 4.5 अरब फ्रैंक की आपात योजना की घोषणा की थी। इस उदाहरण का उल्लेख फ्रांस के मौजूदा छात्र आंदोलन पर प्रकाशित विश्लेषण में भी किया गया है।
2018-19 का येलो वेस्ट आंदोलन: यह आंदोलन ईंधन कर और जीवन-यापन की लागत से जुड़ी शिकायतों के बीच शुरू हुआ था। बाद में इसमें आर्थिक असमानता, ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं और सरकार की नीतियों के खिलाफ व्यापक नाराजगी शामिल हो गई। इसने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की।
2019-20 और 2023 के पेंशन विरोध: पेंशन व्यवस्था में बदलाव के प्रस्तावों के खिलाफ श्रमिक संगठनों ने प्रदर्शन किए। 2023 में मैक्रों सरकार ने सामान्य सेवानिवृत्ति की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 वर्ष करने वाला सुधार आगे बढ़ाया। सरकार ने इसे पेंशन व्यवस्था की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता के लिए जरूरी बताया, जबकि विरोधियों ने इसे कर्मचारियों पर अतिरिक्त बोझ माना।
3. सरकार का क्या है स्टैंड? शिक्षा बजट बढ़ाने का प्रस्ताव, लेकिन खर्च पर दबाव
प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू की सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ छात्रों और शिक्षकों की मांगें हैं, तो दूसरी तरफ देश के सार्वजनिक वित्त और बजट घाटे को नियंत्रित करने का दबाव है।
सरकार ने शिक्षा संबंधी शिकायतों पर बातचीत और कुछ सुधारों का रास्ता अपनाया है। प्रधानमंत्री ने शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं पर काम करने के लिए सरकार को निर्देश दिए। इसमें कक्षाओं का नियमित संचालन, स्कूलों की इमारतों में सुधार, स्कूल के समय की समीक्षा, विश्वविद्यालय प्रवेश प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाना और छात्रों को अपनी बात रखने का अवसर देना शामिल है।
8 अक्टूबर को शिक्षा मंत्री एडुआर गेफ्रे ने 500 से अधिक प्राथमिकता वाले स्कूलों में 3,000 अस्थायी शिक्षकों की तैनाती का लक्ष्य बताया था। 13 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय तक लक्ष्य का लगभग 35 प्रतिशत ही पूरा हुआ था। इससे सरकार की घोषणाओं को जमीन पर लागू करने की चुनौती सामने आती है।
यानी सरकार शिक्षा संबंधी शिकायतों पर बातचीत और सुधार का संकेत दे रही है, लेकिन वह हिंसा के सामने पीछे हटने को तैयार नहीं है। असली परीक्षा यह होगी कि घोषित उपाय स्कूलों में कितनी जल्दी लागू होते हैं।
4. आंदोलन में हिंसा क्यों बढ़ी? पुलिस कार्रवाई और छात्रों की चोटों से नया विवाद
शुरुआती विरोध में शिक्षा संबंधी मांगें प्रमुख थीं। लेकिन स्कूलों के प्रवेश द्वार बंद करने, सड़कों पर प्रदर्शन और पुलिस के हस्तक्षेप के बाद कई जगह तनाव बढ़ गया। सोशल मीडिया पर प्रदर्शन के वीडियो फैलने से आंदोलन को दूसरे शहरों में भी समर्थन मिला।
अक्टूबर के शुरुआती दिनों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। कुछ स्कूलों में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। दूसरी ओर, पुलिस कार्रवाई में छात्रों के घायल होने की खबरों ने भी विवाद बढ़ाया। एक किशोर के हाथ में गंभीर चोट लगने की घटना के बाद फ्रांस में भीड़ नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले हथियारों और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठे। सरकार ने छात्र प्रदर्शनों के संदर्भ में स्टन ग्रेनेड के इस्तेमाल को अस्थायी रूप से निलंबित करने की घोषणा की थी।
यदि सरकार केवल कानून-व्यवस्था पर जोर देती है और स्कूलों की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं करती, तो असंतोष बना रह सकता है। वहीं, यदि हिंसक घटनाओं को आंदोलन की सभी मांगों के साथ मिला दिया जाता है, तो शिक्षा सुधार की मूल बहस पीछे छूटने का खतरा है।
5. 2027 के राष्ट्रपति चुनाव पर क्या पड़ेगा असर? मैक्रों सरकार के लिए बड़ी चुनौती
फ्रांस में 2027 में राष्ट्रपति चुनाव होना है। मौजूदा आंदोलन ऐसे समय तेज हुआ है, जब सरकार को शिक्षा बजट, सार्वजनिक खर्च और आर्थिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में हैं। ऐसे में महंगाई, शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर बढ़ती नाराजगी सत्ता पक्ष की राजनीतिक स्थिति को प्रभावित कर सकती है। विपक्षी दल भी इन मुद्दों को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि मौजूदा आंदोलन किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष में जनमत तैयार कर देगा। छात्र आंदोलन की कोई एक ऐसी प्रतिनिधि संस्था नहीं है जो सभी प्रदर्शनकारियों की ओर से एक समान मांग रखती हो। अलग-अलग समूहों की प्राथमिकताएं भी अलग हैं।
इस आंदोलन का भविष्य तीन बातों पर निर्भर करेगा। पहली, क्या सरकार शिक्षकों की कमी और स्कूलों की बदहाल स्थिति को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाती है? दूसरी, क्या श्रमिक संगठन और विश्वविद्यालय के छात्र इसमें लंबे समय तक शामिल रहते हैं? तीसरी, क्या सरकार और प्रदर्शनकारी हिंसा से बचते हुए बातचीत का रास्ता निकाल पाते हैं?
फ्रांस का पिछला अनुभव बताता है कि बड़े जन आंदोलनों को केवल पुलिस कार्रवाई से समाप्त करना मुश्किल हो सकता है। लेकिन यह भी जरूरी है कि प्रदर्शन के नाम पर हिंसा को जायज न ठहराया जाए। यदि सरकार शिक्षा संबंधी मांगों पर प्रभावी कार्रवाई करती है, तो आंदोलन की तीव्रता कम हो सकती है। यदि वादे और जमीनी स्थिति के बीच अंतर बना रहता है, तो असंतोष आगे भी बढ़ सकता है।
फ्रांस का आंदोलन सिर्फ महंगाई नहीं, सरकारी प्राथमिकताओं पर भी सवाल है
फ्रांस में अक्टूबर 2026 का आंदोलन शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं से शुरू होकर व्यापक सामाजिक असंतोष का रूप ले चुका है। महंगाई, सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता, सरकारी खर्च और युवाओं के भविष्य को लेकर चिंता ने इसे विस्तार दिया है।
मौजूदा संकट की सबसे अहम बात यह है कि प्रदर्शनकारियों की मांगें केवल किसी एक नए कानून को वापस लेने तक सीमित नहीं हैं। वे स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता, बेहतर बुनियादी सुविधाओं, समान अवसर और सरकार की जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
सरकार ने शिक्षा बजट बढ़ाने और सुधारों पर चर्चा करने के संकेत दिए हैं, लेकिन छात्र संगठनों के मुताबिक अभी तक की कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। ऐसे में फ्रांस की सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ लोगों का भरोसा बहाल करने की है।
