नई दिल्ली [TV 47 न्यूज नेटवर्क ]। भारत में चुनावी राजनीति के साथ ईवीएम पर बहस भी लगातार चलती रही है। चुनाव हारने के बाद ईवीएम पर सवाल उठाने की राजनीति नई नहीं है। लेकिन समय-समय पर विपक्षी दलों की ओर से यह मांग जरूर तेज होती रही है कि भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की जगह पुराने बैलट पेपर से चुनाव कराया जाए।
हाल के दिनों में यह मुद्दा फिर चर्चा में है। महाराष्ट्र में विपक्षी नेताओं ने ईवीएम को लेकर सवाल उठाए और बैलट पेपर की वापसी की मांग की। मायावती ने भी ईवीएम पर लोगों के भरोसे को लेकर चिंता जताते हुए बैलट पेपर से चुनाव कराने की मांग की है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या बैलट पेपर वास्तव में ईवीएम से ज्यादा सुरक्षित और पारदर्शी व्यवस्था है?
दूसरा सवाल यह है कि दुनिया के बड़े लोकतांत्रिक देशों में चुनाव किस तरीके से होते हैं? क्या अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और जापान जैसे देशों में ईवीएम का इस्तेमाल होता है? क्या सभी विकसित देशों ने बैलट पेपर को ही बेहतर माना है?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—भारत जैसे 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश के लिए कौन सी व्यवस्था व्यावहारिक, सुरक्षित और भरोसेमंद है?
इन सवालों का जवाब किसी एक राजनीतिक दल के आरोप या बचाव से नहीं बल्कि चुनावी व्यवस्था के पूरे ढांचे को समझने से मिलता है।
1. दुनिया के किन देशों में बैलट पेपर से चुनाव, और कहां ईवीएम का इस्तेमाल?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि दुनिया में चुनाव कराने का कोई एक मॉडल नहीं है। अलग-अलग देशों ने अपनी राजनीतिक व्यवस्था, आबादी, चुनावी इतिहास, तकनीकी क्षमता और प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार मतदान प्रणाली विकसित की है।
ब्रिटेन में मतदान के लिए बैलट पेपर का इस्तेमाल होता है। मतदाता को बैलट पेपर दिया जाता है और वह निर्धारित तरीके से अपनी पसंद के उम्मीदवार या पार्टी के सामने निशान लगाता है। मतदान के बाद बैलट बॉक्स को सुरक्षित स्थान पर ले जाकर मतगणना की जाती है। ब्रिटेन की निर्वाचन आयोग की व्यवस्था में बैलट पेपर की गिनती और संदिग्ध अथवा गलत तरीके से भरे बैलट को अलग करने की स्पष्ट प्रक्रिया है।
जर्मनी में भी संघीय चुनावों में कागजी बैलट का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां मतदान और मतगणना की प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा पेपर आधारित है। जर्मनी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग को लेकर काफी सावधानी बरतने वाले देशों में गिना जाता है।
फ्रांस, इटली, स्पेन, नीदरलैंड, जापान और न्यूजीलैंड जैसे कई लोकतांत्रिक देशों में भी राष्ट्रीय चुनावों में मुख्य रूप से कागजी बैलट का इस्तेमाल किया जाता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरी दुनिया में सिर्फ दो ही विकल्प हैं—बैलट पेपर या ईवीएम।
कई देशों में ऑप्टिकल स्कैनिंग मशीन इस्तेमाल होती है। इसमें मतदाता कागज पर निशान लगाता है और बाद में मशीन उस कागज को स्कैन करके वोटों की गिनती करती है। यानी वोट का मूल रिकॉर्ड कागज पर मौजूद रहता है लेकिन गिनती तकनीक के माध्यम से तेज होती है।
अमेरिका इसका बड़ा उदाहरण है। वहां पूरे देश में एक ही मतदान प्रणाली लागू नहीं है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल होता है। कहीं पेपर बैलट के साथ ऑप्टिकल स्कैनिंग होती है, तो कहीं इलेक्ट्रॉनिक मशीनों का इस्तेमाल होता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि अमेरिका पूरी तरह ईवीएम या पूरी तरह बैलट पेपर वाला देश है।
इंटरनेशनल IDEA के आंकड़ों के अनुसार, 2023 के वैश्विक डेटा सेट में 178 देशों में से 34 देश राष्ट्रीय या उप-राष्ट्रीय स्तर पर किसी न किसी रूप में ई-वोटिंग का इस्तेमाल कर रहे थे। इनमें कुछ देश Direct Recording Electronic यानी DRE मशीनों का इस्तेमाल करते हैं। इस सूची में भारत के साथ ब्राजील, भूटान, बांग्लादेश, बुल्गारिया, मेक्सिको, पनामा, पेरू, रूस और वेनेजुएला जैसे देश शामिल रहे हैं।
इसलिए यह धारणा सही नहीं है कि “दुनिया के विकसित देश ईवीएम का इस्तेमाल नहीं करते।”
असल सच्चाई यह है कि दुनिया में मतदान तकनीक का इस्तेमाल अलग-अलग रूपों में होता है।
2. बैलट पेपर के क्या फायदे हैं और इसकी सबसे बड़ी खामियां क्या हैं?
बैलट पेपर का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मतदाता का वोट आंखों के सामने मौजूद भौतिक रिकॉर्ड के रूप में रहता है।
मतदाता कागज पर अपनी पसंद दर्ज करता है। उस कागज को बैलट बॉक्स में डाल दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर उसी कागज को दोबारा गिना जा सकता है। यही कारण है कि बैलट पेपर को लेकर लोगों में एक मनोवैज्ञानिक भरोसा ज्यादा दिखाई देता है।
बैलट पेपर के प्रमुख फायदे
पहला—वोट का भौतिक रिकॉर्ड। मतदाता को पता रहता है कि उसने कागज पर अपना वोट दर्ज किया है। किसी मशीन की इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रिया पर निर्भरता कम हो जाती है।
दूसरा—रीकाउंट आसान। किसी सीट पर परिणाम को लेकर गंभीर विवाद होने पर बैलट पेपर की दोबारा गिनती की जा सकती है।
तीसरा—सॉफ्टवेयर पर निर्भरता नहीं। बैलट पेपर में वोट दर्ज करने के लिए किसी प्रोग्राम या इलेक्ट्रॉनिक सॉफ्टवेयर की आवश्यकता नहीं होती।
चौथा—आम नागरिक के लिए प्रक्रिया सरल। मतदाता निशान लगाता है और बैलट बॉक्स में डाल देता है।
लेकिन बैलट पेपर की अपनी गंभीर समस्याएं भी हैं। भारत में पहले बड़े पैमाने पर बैलट पेपर से चुनाव हुए हैं। उस दौर में बूथ कैप्चरिंग, बैलट बॉक्स में फर्जी वोट डालना, बैलट पेपर छीन लेना और मतगणना में लंबा समय लगना जैसी समस्याएं चुनावी व्यवस्था के सामने रही हैं। इसके अलावा गलत तरीके से निशान लगाने पर वोट अवैध हो सकता है।
बैलट पेपर की दूसरी बड़ी समस्या है मानवीय गलती। यदि किसी मतदाता ने दो उम्मीदवारों के सामने निशान लगा दिया, निर्धारित जगह के बाहर ऐसा निशान लगा दिया जिससे उसकी पसंद स्पष्ट न हो या बैलट पर ऐसा कोई अन्य निशान बना दिया जिससे उसकी पहचान का संकेत मिले, तो उसका वोट खारिज हो सकता है। ब्रिटेन में भी चुनाव आयोग ऐसी स्थिति में स्पष्ट नियम रखता है कि जिस बैलट पर मतदाता की पसंद निश्चित रूप से स्पष्ट नहीं होती, उसे अस्वीकार किया जा सकता है।
भारत के चुनाव आयोग की अपनी व्याख्या के अनुसार भी पेपर बैलट में गलत मार्किंग से वोट अवैध होने, बैलट बॉक्स में फर्जी मतपत्र डालने और मैनुअल काउंटिंग में मानवीय त्रुटि जैसी चुनौतियां रहती हैं। यानी बैलट पेपर कागज आधारित होने के कारण अपने आप सुरक्षित नहीं हो जाता।
3. ईवीएम में क्या फायदा और कहां उठते हैं सबसे बड़े सवाल?
ईवीएम का सबसे बड़ा फायदा है गति और बड़े पैमाने पर चुनाव कराने की क्षमता।
भारत जैसे विशाल देश में करोड़ों मतदाताओं और लाखों मतदान केंद्रों पर चुनाव कराना आसान काम नहीं है।
ईवीएम में मतदाता अपनी पसंद के उम्मीदवार के सामने बटन दबाता है। भारत की ईवीएम व्यवस्था में बैलेट यूनिट, कंट्रोल यूनिट और VVPAT शामिल हैं। चुनाव आयोग के अनुसार मौजूदा M3 मॉडल की ईवीएम और VVPAT स्टैंड-अलोन, गैर-नेटवर्क वाली इकाइयां हैं और अपने बैटरी/पावर पैक से चलती हैं।
इसका एक महत्वपूर्ण फायदा यह है कि वोट डालने के बाद मतगणना में हर बैलट को हाथ से अलग-अलग पढ़ने की जरूरत नहीं होती।
ईवीएम के प्रमुख फायदे
पहला—मतगणना तेज। लाखों वोटों की गणना अपेक्षाकृत तेजी से हो सकती है।
दूसरा—अवैध वोट की समस्या लगभग समाप्त। मतदाता केवल उपलब्ध उम्मीदवारों में से एक के सामने बटन दबाता है। दो उम्मीदवारों के सामने गलती से निशान लगाने जैसी समस्या नहीं रहती।
तीसरा—बूथ कैप्चरिंग की पुरानी शैली पर रोक। पुराने दौर में बैलट बॉक्स में बड़ी संख्या में फर्जी मतपत्र डालना अपेक्षाकृत आसान था। ईवीएम में एक वोट दर्ज होने के बाद अगला वोट डालने के लिए प्रक्रिया को फिर सक्रिय करना पड़ता है।
चौथा—कागज की जरूरत कम। पूरे देश में करोड़ों मतपत्र छापने, पहुंचाने और सुरक्षित रखने की जरूरत कम होती है।
पांचवां—VVPAT की सुविधा। मतदाता बटन दबाने के बाद VVPAT विंडो में कुछ सेकंड के लिए अपनी पसंद के उम्मीदवार का नाम, क्रम संख्या और चुनाव चिह्न देख सकता है। उसके बाद पर्ची सुरक्षित ड्रॉप बॉक्स में चली जाती है।
यही VVPAT ईवीएम व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण कागजी ऑडिट ट्रेल है। लेकिन ईवीएम की सबसे बड़ी चुनौती तकनीकी से ज्यादा विश्वास की है। एक आम मतदाता मशीन के भीतर चल रही तकनीकी प्रक्रिया को खुद नहीं देख सकता। वह केवल मशीन का बाहरी परिणाम देखता है।
यहीं से सवाल उठते हैं। क्या मशीन सही तरीके से काम कर रही है? क्या मशीन में कोई बदलाव किया जा सकता है? क्या जिस वोट को मतदाता ने डाला है, वही वोट अंतिम परिणाम में दर्ज हुआ?
इन सवालों का जवाब केवल यह कहकर नहीं दिया जा सकता कि मशीन सुरक्षित है। चुनाव जैसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में तकनीकी सुरक्षा के साथ सार्वजनिक विश्वास भी जरूरी है। इसीलिए VVPAT जैसी व्यवस्था महत्वपूर्ण है।
4. दुनिया में ईवीएम को लेकर भी विवाद, कई देशों ने क्यों बदली व्यवस्था?
ईवीएम को लेकर सिर्फ भारत में सवाल नहीं उठे हैं। दुनिया के कई देशों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग को अपनाया और बाद में उसके कुछ रूपों को सीमित या समाप्त भी किया।
इंटरनेशनल IDEA के अनुसार, उसके वैश्विक डेटा में कुछ देशों ने ई-वोटिंग का इस्तेमाल शुरू करने के बाद उसे छोड़ दिया है। 2023 के उसके विश्लेषण में 11 देशों में ई-वोटिंग छोड़ दिए जाने का उल्लेख था और भरोसे तथा सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं इसके कारणों में शामिल थीं।
इसका मतलब यह नहीं कि इलेक्ट्रॉनिक मतदान असफल व्यवस्था है। इसका अर्थ यह है कि चुनाव में तकनीक अपनाने का निर्णय केवल तकनीक की क्षमता से नहीं बल्कि जनता के विश्वास, ऑडिट, कानूनी ढांचे और प्रशासनिक व्यवस्था से तय होता है।
यही वजह है कि कुछ देश पेपर बैलट को प्राथमिकता देते हैं। कुछ देश पेपर बैलट को मशीन से स्कैन कराते हैं। कुछ देश सीधे इलेक्ट्रॉनिक मशीन से वोट लेते हैं। और कुछ देशों में इंटरनेट वोटिंग का भी प्रयोग हुआ है।
एस्टोनिया इंटरनेट वोटिंग के लिए जाना जाता है। वहीं ब्राजील ने बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग को अपनाया है। इंटरनेशनल IDEA के आंकड़ों में ब्राजील को DRE यानी Direct Recording Electronic मशीनों के इस्तेमाल वाले देशों में रखा गया है।
भारत की व्यवस्था ब्राजील जैसी ही नहीं है। भारत की ईवीएम की डिजाइन, प्रशासनिक प्रक्रिया, VVPAT और चुनावी कानून अलग हैं।
इसीलिए केवल यह कहना कि “ब्राजील में ईवीएम है इसलिए भारत सही है” या “जर्मनी में बैलट पेपर है इसलिए भारत को भी बैलट पेपर अपनाना चाहिए”, दोनों अधूरे तर्क होंगे। हर देश का चुनावी मॉडल उसकी अपनी परिस्थितियों से जुड़ा है।
5. भारत के लिए बैलट पेपर या ईवीएम—कौन सी व्यवस्था बेहतर?
अब सबसे बड़ा सवाल।
भारत में कौन सी व्यवस्था सही रहेगी?
इसका सीधा जवाब यह है कि भारत के वर्तमान आकार, जनसंख्या, चुनावी क्षेत्र, मतदान केंद्रों की संख्या और चुनाव की गति को देखते हुए EVM+VVPAT व्यवस्था को बनाए रखना अधिक व्यावहारिक दिखाई देता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ईवीएम व्यवस्था को बिना सवालों के स्वीकार कर लिया जाए। बल्कि इसके साथ और अधिक पारदर्शिता, स्वतंत्र ऑडिट और मजबूत VVPAT व्यवस्था होनी चाहिए।
भारत में एक लोकसभा चुनाव में करोड़ों लोग मतदान करते हैं। इतनी बड़ी संख्या में बैलट पेपर छापना, उन्हें मतदान केंद्रों तक पहुंचाना, सुरक्षित रखना और फिर करोड़ों मतपत्रों की मैनुअल गिनती करना बहुत बड़ा प्रशासनिक अभियान होगा।
इसके अलावा भारत में चुनाव केवल शहरों तक सीमित नहीं हैं। पहाड़ी क्षेत्र, रेगिस्तान, जंगल, द्वीप, दूरदराज के गांव और अत्यंत दुर्गम इलाके भी चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा हैं। ऐसे में EVM का कम कागज, तेज मतदान और तेज मतगणना वाला मॉडल प्रशासनिक रूप से बड़ा फायदा देता है।
लेकिन लोकतंत्र में स्पीड से ज्यादा महत्वपूर्ण भरोसा है। इसलिए भारत के लिए सबसे बेहतर रास्ता संभवतः यह है—
EVM को हटाने के बजाय EVM-VVPAT प्रणाली को और अधिक ऑडिट योग्य बनाया जाए।
यानी चुनावी व्यवस्था में तीन चीजें एक साथ हों।
पहली—ईवीएम की तकनीकी सुरक्षा।
दूसरी—VVPAT के माध्यम से कागजी प्रमाण।
तीसरी—स्वतंत्र और पारदर्शी ऑडिट।
भारत का सुप्रीम कोर्ट अप्रैल 2024 में EVM को हटाकर बैलट पेपर पर लौटने और 100 प्रतिशत VVPAT मिलान की मांग को स्वीकार नहीं कर चुका है। अदालत ने EVM व्यवस्था में मौजूद सुरक्षा उपायों और प्रोटोकॉल को देखते हुए उसे जारी रखने का रास्ता चुना। साथ ही उसने कुछ अतिरिक्त सुरक्षा और सत्यापन संबंधी निर्देश भी दिए।
अदालत ने VVPAT सत्यापन के लिए प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र या संसदीय क्षेत्र के विधानसभा खंड में पांच EVM की जांच की व्यवस्था को स्वीकार किया और उम्मीदवारों के लिए कुछ परिस्थितियों में मशीनों की जांच का रास्ता भी रखा।
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। ईवीएम बनाम बैलट पेपर की बहस को “कौन सही, कौन गलत” की राजनीति में बदलने के बजाय “कौन सी व्यवस्था सबसे ज्यादा भरोसेमंद और ऑडिट योग्य है” के रूप में देखना चाहिए।
बैलट पेपर बनाम ईवीएम: एक नजर में
| आधार | बैलट पेपर | EVM + VVPAT |
|---|---|---|
| वोट का रिकॉर्ड | कागज पर | इलेक्ट्रॉनिक + VVPAT |
| मतगणना | मुख्यतः मैनुअल/स्कैनिंग | इलेक्ट्रॉनिक |
| परिणाम की गति | अपेक्षाकृत धीमी | तेज |
| अमान्य वोट | संभव | बहुत कम |
| कागज की जरूरत | बहुत ज्यादा | कम |
| मानवीय गिनती की गलती | अधिक संभावना | कम |
| मशीन पर निर्भरता | नहीं | हां |
| तकनीकी भरोसा | कम आवश्यकता | महत्वपूर्ण |
| दोबारा गिनती | आसान | VVPAT/नियम आधारित |
| बूथ कैप्चरिंग/बैलेट स्टफिंग | ऐतिहासिक चुनौती | पुराने तरीके की गुंजाइश कम |
| सार्वजनिक भरोसा | भौतिक रिकॉर्ड के कारण अधिक महसूस हो सकता है | VVPAT और ऑडिट पर निर्भर |
| बड़े देश में प्रशासन | बहुत बड़ा लॉजिस्टिक बोझ | अधिक व्यावहारिक |
क्या बैलट पेपर ज्यादा लोकतांत्रिक है?
यह कहना भी सही नहीं होगा। लोकतंत्र का आधार बैलट पेपर नहीं, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव है। यदि बैलट पेपर के साथ मतदाता को डराया जाए, बैलट बॉक्स की सुरक्षा कमजोर हो, फर्जी मतपत्र डाले जाएं या मतगणना में पारदर्शिता न हो तो सिर्फ कागज होने से चुनाव लोकतांत्रिक नहीं हो जाता।
इसी तरह केवल ईवीएम होने से चुनाव स्वतः निष्पक्ष नहीं हो जाता। चुनाव की विश्वसनीयता पांच प्रमुख स्तंभों पर निर्भर करती है— मतदाता सूची की शुद्धता, मतदान की निष्पक्षता, मशीन या बैलट की सुरक्षा, पारदर्शी मतगणना और स्वतंत्र ऑडिट।
अगर इन पांचों में से कोई एक कमजोर है तो पूरी व्यवस्था पर सवाल उठेंगे। यही कारण है कि आज दुनिया में चुनावी तकनीक का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि “पेपर या मशीन?”
बल्कि सवाल है— “क्या मतदाता अपने वोट के रिकॉर्ड को स्वतंत्र रूप से सत्यापित कर सकता है और क्या चुनाव परिणाम को स्वतंत्र तरीके से ऑडिट किया जा सकता है?”
भारत में क्या बदलाव जरूरी हो सकते हैं?
भारत में EVM+VVPAT व्यवस्था जारी रखते हुए भी इसे और मजबूत बनाया जा सकता है। पहला सुझाव है कि VVPAT ऑडिट को लेकर राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों के बीच लगातार संवाद हो।
दूसरा, मशीनों की तकनीकी जांच से जुड़े प्रोटोकॉल को अधिकतम संभव सीमा तक सार्वजनिक किया जाए, ताकि तकनीकी विशेषज्ञ स्वतंत्र रूप से प्रक्रिया को समझ सकें।
तीसरा, चुनाव बाद ऑडिट की व्यवस्था को और मजबूत किया जा सकता है। चौथा, मशीनों की सुरक्षा, परिवहन, स्टोरेज और रैंडमाइजेशन की प्रक्रिया में राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की भागीदारी को और स्पष्ट किया जाना चाहिए।
पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण—चुनाव आयोग को तकनीकी जानकारी के साथ-साथ जनविश्वास पर भी उतना ही जोर देना चाहिए।
चुनाव आयोग के अनुसार भारत की मौजूदा ECI-EVM बाहरी नेटवर्क से जुड़ी नहीं होती और इसमें वायरलेस कनेक्टिविटी नहीं होती। आयोग यह भी बताता है कि मशीनों की जांच, मॉक पोल, रैंडमाइजेशन और VVPAT मिलान जैसी कई प्रक्रियाएं चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इन सुरक्षा उपायों की जानकारी जनता तक सरल भाषा में पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।
भारत में कौन सी व्यवस्था श्रेष्ठ?
दुनिया का अनुभव बताता है कि न तो बैलट पेपर अपने आप सुरक्षित है और न ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग अपने आप असुरक्षित।
ब्रिटेन, जर्मनी और कई अन्य देशों ने कागजी मतदान को प्राथमिकता दी है। वहीं भारत और ब्राजील जैसे देशों ने बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक मतदान को अपनाया है। अमेरिका में दोनों तरह की तकनीकों का मिश्रित मॉडल दिखाई देता है। इंटरनेशनल IDEA का वैश्विक डेटा भी बताता है कि चुनावी तकनीक देशों में काफी अलग-अलग है।
भारत के संदर्भ में देखें तो देश की विशाल आबादी, चुनावों का पैमाना, लाखों मतदान केंद्र, तेजी से परिणाम घोषित करने की जरूरत और पुराने दौर की बैलट संबंधी चुनौतियां EVM+VVPAT व्यवस्था के पक्ष में मजबूत तर्क देती हैं।
इसलिए फिलहाल भारत के लिए बैलट पेपर पर पूरी तरह लौटने के बजाय EVM+VVPAT व्यवस्था को और पारदर्शी, ऑडिट योग्य और भरोसेमंद बनाना ज्यादा व्यावहारिक विकल्प है।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लोकतंत्र में केवल चुनाव आयोग का यह कहना पर्याप्त नहीं कि मशीन सुरक्षित है। विपक्ष का सवाल पूछना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
अंततः चुनाव की विश्वसनीयता तब बढ़ेगी जब सत्ता पक्ष को परिणाम पर भरोसा हो, विपक्ष को प्रक्रिया पर भरोसा हो और आम मतदाता को यह विश्वास हो कि उसका वोट उसी उम्मीदवार के खाते में गया जिसे उसने चुना था।
इसलिए आने वाले समय की सबसे सार्थक बहस शायद यह नहीं होगी कि “ईवीएम हटाओ या बैलट लाओ।”
बल्कि यह होगी कि— “जो भी मतदान प्रणाली हो, उसे इतना पारदर्शी और ऑडिट योग्य कैसे बनाया जाए कि चुनाव हारने वाला भी परिणाम को स्वीकार करे और जीतने वाला भी उसे लोकतांत्रिक जनादेश माने।”
