नई दिल्ली [TV 47 न्यूज नेटवर्क ]। भारत में चुनावी प्रक्रिया को लेकर EVM और बैलेट पेपर की बहस एक बार फिर तेज हो गई है। विपक्षी दल EVM की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए बैलेट पेपर की वापसी की मांग कर रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग और सरकार EVM को अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बताते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बैलेट पेपर के दौर में बूथ कैप्चरिंग और चुनावी धांधली अधिक होती थी? क्या EVM आने के बाद चुनावी तस्वीर बदली? और आखिर विपक्ष की आशंकाएं क्या हैं?
EVM और बैलेट पेपर की बहस क्यों चर्चा में है?
हाल के वर्षों में कई विपक्षी दलों ने EVM की विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और मतदाता को यह विश्वास होना चाहिए कि उसका वोट उसी उम्मीदवार को गया है जिसे उसने चुना है। इसी आधार पर कुछ दल बैलेट पेपर प्रणाली की वापसी की मांग करते हैं।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि भारतीय EVM स्वतंत्र रूप से काम करती हैं, इंटरनेट या किसी नेटवर्क से नहीं जुड़ी होतीं और VVPAT प्रणाली के जरिए मतदाता अपने वोट की पुष्टि भी कर सकता है।
बैलेट पेपर के दौर में क्या होती थी बूथ कैप्चरिंग?
भारत में 1950 के दशक से लेकर 1990 के दशक तक बैलेट पेपर से मतदान होता था। चुनावी इतिहास में बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान, बैलेट बॉक्स भरने और मतपत्रों की लूट जैसी घटनाएं कई राज्यों में दर्ज की गईं। यही कारण था कि चुनाव आयोग ने तकनीकी विकल्प तलाशना शुरू किया।
चुनाव आयोग के अनुसार बैलेट पेपर प्रणाली की कुछ प्रमुख समस्याएं थीं—
- अवैध या अमान्य वोटों की बड़ी संख्या
- बैलेट बॉक्स में फर्जी मतपत्र भरना
- बूथ पर कब्जा कर सामूहिक मतदान
- मतगणना में लंबा समय
- मानवीय त्रुटियों की संभावना
चुनाव आयोग की EVM FAQ में भी कहा गया है कि बैलेट बॉक्स को कुछ मिनटों के लिए कब्जे में लेकर बड़ी संख्या में फर्जी वोट डाले जा सकते थे।
EVM कब आई?
भारत में पहली बार EVM का प्रयोग 1982 में केरल के परूर विधानसभा क्षेत्र में हुआ था। इसके बाद कई चरणों में प्रयोग बढ़ाया गया और 2004 के लोकसभा चुनाव में पहली बार पूरे देश में EVM का उपयोग किया गया।
कांग्रेस की बड़ी जीतें और बैलेट पेपर का दौर
लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को बैलेट पेपर युग में कई बार भारी बहुमत मिला।
| वर्ष | कांग्रेस सीटें |
|---|---|
| 1951-52 | 364 |
| 1957 | 371 |
| 1962 | 361 |
| 1980 | 353 |
| 1984 | 414 |
ये आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस लंबे समय तक भारतीय राजनीति की प्रमुख शक्ति रही। हालांकि केवल इन चुनावी परिणामों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि जीत का कारण धांधली थी, तथ्यात्मक रूप से सिद्ध नहीं है। इन चुनावों के पीछे तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियां, संगठनात्मक ताकत, विपक्ष की स्थिति और जनसमर्थन जैसे कई कारण थे।
EVM के दौर में कांग्रेस का प्रदर्शन
2004 से पूरे देश में EVM का उपयोग शुरू हुआ। इसके बाद लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन इस प्रकार रहा—
| वर्ष | कांग्रेस सीटें |
|---|---|
| 2004 | 145 |
| 2009 | 206 |
| 2014 | 44 |
| 2019 | 52 |
| 2024 | 99 |
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि EVM के दौर में भी कांग्रेस दो बार केंद्र में सरकार बनाने में सफल रही। इसलिए यह कहना कि EVM केवल किसी एक दल को लाभ पहुंचाती है, चुनाव आयोग और कई विश्लेषकों के अनुसार उपलब्ध चुनावी परिणामों से स्वतः सिद्ध नहीं होता। अलग-अलग चुनावों में विभिन्न दलों की जीत-हार देखने को मिली है।
क्या EVM से बूथ कैप्चरिंग खत्म हो गई?
चुनाव आयोग का दावा है कि EVM ने बूथ कैप्चरिंग को काफी हद तक अप्रभावी बना दिया है।
कारण यह है कि EVM में एक मिनट में सीमित संख्या में ही वोट डाले जा सकते हैं। आयोग के अनुसार EVM चार वोट प्रति मिनट से अधिक दर्ज नहीं कर सकती। यदि कोई बूथ पर कब्जा भी कर ले तो बहुत कम समय में हजारों वोट डालना संभव नहीं होता। इससे सुरक्षा बलों को हस्तक्षेप का समय मिल जाता है।
विपक्ष की आशंकाएं क्या हैं?
विपक्षी दलों की प्रमुख चिंताएं निम्न हैं—
1. मशीन की पारदर्शिता
कुछ दलों का तर्क है कि मतदाता मशीन के अंदर की प्रक्रिया नहीं देख सकता।
2. VVPAT की 100 प्रतिशत गिनती
कई विपक्षी दल चाहते हैं कि सभी VVPAT पर्चियों की गिनती हो ताकि मशीन और कागजी रिकॉर्ड का पूर्ण मिलान हो सके।
3. तकनीकी छेड़छाड़ की आशंका
कुछ नेताओं और तकनीकी विशेषज्ञों ने समय-समय पर EVM की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए हैं।
4. मतदाता विश्वास
विपक्ष का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया में केवल निष्पक्षता ही नहीं बल्कि निष्पक्षता का दिखना भी आवश्यक है।
चुनाव आयोग क्या कहता है?
चुनाव आयोग लगातार कहता रहा है कि भारतीय EVM इंटरनेट से नहीं जुड़ी होतीं, इनमें कोई वायरलेस कनेक्टिविटी नहीं होती और मतदान से पहले तथा बाद में कई स्तर की जांच और सीलिंग प्रक्रिया अपनाई जाती है।
आयोग के अनुसार—
- मशीनों का रैंडम आवंटन होता है।
- राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि जांच प्रक्रिया में शामिल रहते हैं।
- मतदान से पहले मॉक पोल कराया जाता है।
- VVPAT से वोट की पुष्टि होती है।
- मतदान के बाद मशीनें सीलबंद स्ट्रॉन्ग रूम में रखी जाती हैं।
क्या अदालतों ने EVM पर टिप्पणी की है?
विभिन्न मामलों में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने EVM के उपयोग को वैध माना है। चुनाव आयोग ने कई बार कहा है कि अदालतों ने EVM प्रणाली को स्वीकार किया है। बाद में मतदाता विश्वास बढ़ाने के लिए VVPAT प्रणाली भी जोड़ी गई।
क्या बैलेट पेपर की वापसी संभव है?
तकनीकी रूप से यह संभव है, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियां जुड़ी होंगी—
- करोड़ों मतपत्रों की छपाई
- लंबी मतगणना
- अमान्य मतों की वापसी
- बूथ कैप्चरिंग और बैलेट स्टफिंग की पुरानी समस्याओं का जोखिम
- चुनावी खर्च में वृद्धि
इसी वजह से चुनाव आयोग लगातार EVM और VVPAT मॉडल का समर्थन करता रहा है
