नई दिल्ली [ टीवी 47 नेटवर्क ] ईरान पर अमेरिका और इज़रायल ने क्यों हमला किया—यह सवाल सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई का नहीं, बल्कि दशकों से चल रहे भू-राजनीतिक संघर्ष, वैचारिक टकराव, परमाणु महत्वाकांक्षाओं और क्षेत्रीय प्रभुत्व की जंग का हिस्सा है। हाल के वर्षों में ईरान, अमेरिका और इज़रायल के बीच तनाव कई बार सीधे सैन्य टकराव के मुहाने तक पहुंचा है।
यह स्टोरी इस सवाल की पड़ताल करती है कि हमले के पीछे कौन-कौन सी बड़ी रणनीतिक वजहें हो सकती हैं। इसमें अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों की क्या राय है।
टकराव की जड़ें
1. 1979 की इस्लामी क्रांति और रिश्तों में दरार
1979 में Iranian Revolution के बाद ईरान में शाह का शासन खत्म हुआ और एक इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई। इसके बाद अमेरिका-ईरान रिश्ते शत्रुतापूर्ण हो गए। तेहरान में अमेरिकी दूतावास बंधक संकट ने दोनों देशों के बीच अविश्वास की गहरी खाई पैदा कर दी।
इज़रायल के साथ तो स्थिति और भी जटिल रही। ईरान की नई व्यवस्था ने इज़रायल को वैध राष्ट्र मानने से इनकार किया और उसे “कब्ज़ा करने वाला राज्य” कहा।
वजह 1: परमाणु कार्यक्रम—सबसे बड़ा विवाद
JCPOA और उसका टूटना
2015 में Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) पर समझौता हुआ। इस समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमति दी, बदले में उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए गए।
लेकिन 2018 में Donald Trump प्रशासन ने इस समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया। इसके बाद ईरान ने भी प्रतिबद्धताओं में ढील देना शुरू किया।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
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विशेषज्ञों के अनुसार, परमाणु मुद्दा सिर्फ हथियार बनाने का सवाल नहीं, बल्कि “प्रतिरोध की क्षमता” का प्रतीक है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि इज़रायल को डर है कि परमाणु हथियार संपन्न ईरान उसकी सुरक्षा के लिए अस्तित्वगत खतरा होगा।
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विशेषज्ञों तर्क देते हैं कि सैन्य हमला अक्सर कूटनीतिक विकल्पों को कमजोर करता है।
इज़रायल लंबे समय से कहता आया है कि वह ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा।
वजह 2: प्रॉक्सी युद्ध और क्षेत्रीय प्रभाव
ईरान ने क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए विभिन्न समूहों को समर्थन दिया है—
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लेबनान में Hezbollah
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गाज़ा में Hamas
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यमन में Houthi movement
इज़रायल का आरोप है कि ये समूह सीधे उसकी सुरक्षा को चुनौती देते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान “डायरेक्ट वार” से बचते हुए “असिमेट्रिक वॉरफेयर” की रणनीति अपनाता है।
वजह 3: इज़रायल की सुरक्षा सिद्धांत
इज़रायल का सुरक्षा सिद्धांत “प्रीएम्प्टिव स्ट्राइक” पर आधारित रहा है। 1981 में उसने इराक के परमाणु रिएक्टर पर हमला किया था (ऑपरेशन ओसिराक)।
इज़रायली रणनीतिक समुदाय का मानना है कि अगर खतरा बढ़ता दिखे, तो इंतज़ार करने के बजाय पहले हमला करना बेहतर है।
वजह 4: घरेलू राजनीति और शक्ति संतुलन
घरेलू राजनीति भी बड़ी वजह हो सकती है।
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अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों के दौरान विदेश नीति का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है।
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इज़रायल में नेतृत्व पर दबाव होने की स्थिति में कठोर रुख अपनाना राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है।
विश्लेषकों का कहना है कि “बाहरी दुश्मन” की अवधारणा कभी-कभी घरेलू समर्थन जुटाने का माध्यम बनती है।
वजह 5: क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और खाड़ी राजनीति
मध्य पूर्व में सऊदी अरब और ईरान के बीच प्रतिस्पर्धा लंबे समय से चली आ रही है।
अमेरिका खाड़ी देशों के साथ अपने गठबंधन को बनाए रखना चाहता है। ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और तेल बाजार की स्थिरता—ये सब दांव पर होते हैं।
क्या सैन्य कार्रवाई समाधान है?
विशेषज्ञों की राय में सैन्य हमला परमाणु कार्यक्रम को अस्थायी रूप से रोक सकता है। लेकिन इससे ईरान की “हार्डलाइन” राजनीति मजबूत हो सकती है। क्षेत्रीय युद्ध का खतरा बढ़ सकता है।
टकराव या कूटनीति?
ईरान पर हमला किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों की जटिल राजनीति, सुरक्षा चिंताओं और वैचारिक टकराव का नतीजा है।
मुख्य पांच वजहें संक्षेप में:
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परमाणु कार्यक्रम और अविश्वास
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प्रॉक्सी युद्ध
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इज़रायल की प्रीएम्प्टिव सुरक्षा नीति
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घरेलू राजनीतिक दबाव
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क्षेत्रीय शक्ति संतुलन
अंततः सवाल यह है कि क्या सैन्य रास्ता दीर्घकालिक स्थिरता ला सकता है, या फिर कूटनीतिक पहल ही एकमात्र टिकाऊ समाधान है?
मध्य पूर्व का इतिहास बताता है कि हर हमला सिर्फ एक नई कहानी की शुरुआत होता है—अंत नहीं।
